मसलन

मसलन कहूँ की घर जाना है
न जाने किस राह जाना है
कई इशारे मिलते गए मुसाफिरों से
न मालूम किस इशारे का रुख अपनाना है.

मसलन कहूँ की ऊंचाई से डर लगता है
फिर नदी से भी तो कमबख्त डर लगता है
न मालूम ये परिंदे आसमान में रास्ता कैसे पहचान करते है.
मुझे तो खाली ज़मीन से भी डर लगता है.

मसलन कहूँ की नींद नहीं है
आँखे बंद करने की अदा भी खूब है
सो जाऊं तो सुकून मिल जाता है
न सो पाऊं तो कौन सा सोना आता है.

मसलन कहूँ की घर जला है किसी का
आग से जिस्म नहीं दिल जला है किसी का
तुम मशाल जलाते हो किसी को जलाने के लिए
कभी चिंगारी से भी हाथ जला है किसी का ?

मसलन कहूँ की ये मुस्कान बीमार दिल की निशानी है
होंटो पर ये सुर्खी, जिस्म से, महक बातो में चंचलता आनी जानी है
यूँ अदा से न इतरा गुनाह कर रही है
तेरे बदन की खुशबु दो दिन की कहानी है.

मसलन कहूँ की ये तख्तो ताज सब मिट जाएगा
तेरा जिस्म एक दिन मिटटी में मिल जाएगा
तू जो बुलंदी पर इतना गुरुर करता है
उस अँधेर अज़ाब से तू भी न बच पाएगा।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/09/2016

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