मेरा मेरा

है सब तेरा
कहाँ कुछ मेरा
करूं मैं हरदम
मेरा मेरा
कुछ पलों का
है यह डेरा
जीवन तो है
बस इक फेरा
माटी का है उपकार
जो जीवन जी भर
हमने खेला
कभी हंसाया
कभी रुलाया
भागता गया
ज़िन्दगी का रेला
खुलते ही आँख
हुआ सब मेरा
जब मूँद ली पलकें
फिर कहाँ कुछ मेरा
बुना जीवन इक
जाल है तेरा
हमें तो बस
रंगों ने घेरा
पालें हैं भ्रम
कैसे कैसे
न जाना
रचाया खेल यह तेरा
है अति सुंदर
पर है सपना
जब टूटे तब
कहाँ कुछ अपना
फिर
किऊँ मैं सोचूं
तेरा मेरा
जीवन भ्रम है
है जोगी वाला फेरा
नहीं कुछ मेरा
है सब तेरा
फिर काहे का
मेरा मेरा

6 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 02/09/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 22/06/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/09/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 22/06/2018
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 22/06/2018

Leave a Reply