कैसी आबाद वीरान बस्ती

कैसी आबाद वीरान बस्ती है शहर में,
जहाँ दोस्ती भी कमवास्तो से बनी हुई है,
उसकी छत और मेरी ज़मीन एक है पर,
न जाने फिर क्यूँ दुरीयां बनी हुई है.

इस नई सी इमारत में चार माले है,
कौन सा किसका है सबमे एक जैसे ताले है,
मेरे गाँव आना पड़ोसी के मेहमान को भी अपना मानते है,
यहाँ तो अपने भी नहीं गैर क्या ख़ाक मिलने वाले है.

जितना पानी उतने पैसे मीटर लगा है बिजली का,
पैसो से है प्यास भुजती अजीब तमाशा शहरो का,
गाँव का वो पुराना मीठा कुआं याद आता है मुझे,
प्यास असल वहीँ भुजती थी, शुक्र भेज कर अल्लाह का.

वो चार दुकाने छोड़ कर मम्मरू हलवाई की अंगड़ाई,
मेहमानों के आने पर वो दस्तरखान और चटाई,
कब्रिस्तान में भी खेलते है जहाँ मासूम बच्चे,
यहाँ रिहाइश इलाको में भी वही काली परछाई.

कभी तांगा तो कभी बैलगाडी सड़क से गुज़रती है,
दूर कहीं जाना है तो सबको ऊपर भर्ती है,
वो ताज़ा हवा वो हरे गन्ने की मिठास मुफ्त थी,
यहाँ गाड़ी से तेज़ मीटर की रफ़्तार सड़को पर चलती है.

वो दिन दूर नहीं जब एहसास की भी कीमत लगेगी,
मातम, ख़ुशी, हंसी, मुस्कान, आंसू नोटों से तुलेगी,
रिश्ते नाते दोस्ती मिलन सब किराये पर होंगे,
एक दिन इस मासूम इंसानियत की भी बोली लगेगी.

दानिश मिर्ज़ा

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 01/09/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/09/2016

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