आकृतियाँ

कुछ वर्ष पहले की ही बात है ,
जब मैं गली की एक ,
सीलनभरी कोठरी में ,
रहा करती थी।
और सीलन के कारण ,
दीवाल पर पड़ी आडी तिरछी ,
रेखाओं को कुछ पढ़ सकने की,
हद तक पढ़ा करती थी। ,
पढ़ा करती थी।

और उन अस्पष्ट रेखाओं को ,
अपनी कल्पनाओं से ,
नित्य नए रूप और ,
आकृतियाँ देना ,
क्या बताऊँ ,
क्यां अनुभूतियाँ थी।

कुछ भी हो मेरा ,मेरी कल्पना का ,
उन आकृतियों पर पूरा अधिकार था ,
आज जब मैं अपने शानदार ,
विला फ्लैट में रहतीं हूँ ,
तो उन आकृतियों से भूले से ही ,
मुलाक़ात हो पाती है।

किसी रूठी सखी के समान ,
देख कर भी मुँह फेर लेती हैं ,
जैसे कि ,उनसे मेरा कहीं ,
दूर दूर तक नाता ना हो।

लगता है कहीं टूट कर,
बिखर गया है मेरा मैं मुझसे ,
कि खुद से ही पराई हो गईं हूँ मैं।

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2016
    • Manjusha Manjusha 31/08/2016
  2. babucm babucm 31/08/2016
    • Manjusha Manjusha 31/08/2016
    • Manjusha Manjusha 31/08/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/09/2016
  4. mani mani 31/08/2016
    • Manjusha Manjusha 31/08/2016

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