तुम्ही में तुम,मुझी में मैं

तुम्ही में तुम ,मुझी में मै, ना हो पाए।
कितनी कौशिशें की मगर कमबख्त हम अलग ना हो पाए।।

ये ख्वाईश जो ना तेरी थी,
ना ही मेरी थी,
शायद खुदा की होंगी ,की हम एक एक हो पाए ।।

मुझे मालूम था ये ज़ेहर है जो सेहद सा है दिखरहा
बहुत चाहा मगर इससे दूर ना हो पाए।।

किस तरह कैद से हो गए थे तेरे मंजरों में
कि बाँह फैलाये पुकारती रही दुनिया ,मगर उसके ना हो पाए।।
-राहुल अवस्थी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  2. babucm babucm 31/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 31/08/2016

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