मैं डरता हूँ

मैं डरता हूँ

चंद्र मुख के दाग दिख न जाए
अंधेरों का आवरण मैं करता हूँ

मैं डरता हूँ

न मार सके भूख मुझे
औरों के निवाले हरता हूँ

मैं डरता हूँ

लोगों में सर ऊँचा रहे अपना
ईमान की नजर में गिरता हूँ

मैं डरता हूँ

छिन न जाए जो छीना था मैंने
हर न्याय से अब मैं लड़ता हूँ

मैं डरता हूँ

जिससे कौम बढ़ती जाए हमारी
खून इन्सानियत का करता हूँ

मैं डरता हूँ

गरीबों की आह की रोटी बना
गरीबी की घाँस मैं चरता हूँ

मैं डरता हूँ

नफरत के बाजारों में न हो मंदी कभी
सूखे जख्मों को कुरेदा करता हूँ

मैं डरता हूँ

सम्पन्न रहे रुढ़ियों की बेटी
अज्ञान की गोद मैं भरता हूँ

मैं डरता हूँ

मिले रक्षा कवच अवगुणों को
हर मंदिर में मंत्र ये पढ़ता हूँ

मैं डरता हूँ

आजादी आ न बसे मन में
शब्दपाश नित्य नये गढ़ता हूँ

मैं डरता हूँ

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/08/2016
  2. Uttam Uttam 30/08/2016
  3. C.M. Sharma babucm 30/08/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2016

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