::: भीग गया मैं :::

::: भीग गया मैं :::
आज भीग गया मैं बारिश में
मन की मिट्टी गीली हो गई
भावों की उंगलियों में जन्मी चंचलता
न जाने कितने सपनों के पुतले बना गई
पुतले जो बेजान हो कर भी
निरीह उस सोंच को दिशा दे गई
जो रेत में कदमों के निशान तलाशती
आंधियों से पूछती जीवन के राज

मिट्टी के सूखते ही
ये कैसी अकड़ आ गई
दरारें पड़ने लगी तन मन में
गीली मिट्टी का लेप लगा
भरे कुछ ऊपरी घाव

समय के निर्झर में भीग
ये पुतले बनते बिगड़ते
लेते नित्य नवीन रूप
कैसे रंग बदल रहे ये
पडी जो थोड़ी धूप

कुछ मिट्टी नहीं बन पाते पुतले
शायद बारिश उन्हें भिगो नहीं पाती
या कंकड गड़ते हैं शरीर पर
कुछ बह जाते हैं धारा के साथ
एक हो कर उन बूँदों में

सबसे नहीं होता भीग पाना
मन को मिट्टी होना होता है
बूँदों में बोना होता है जीवन
समय के चक्र में रख संयम
ढलना होता है जीवन को
जल कर पक कर ही फिर
संजो सके जो कुछ बूँद
खुद में उस निरंतर के लिए

5 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
    • Uttam Uttam 30/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/08/2016
  3. babucm babucm 30/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2016

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