गजल (जिन्दगी का नूर)

बह्र: 2122 2122 212
काफिया -अता, रदीफ़ नहीं

ऐ खुदा तू क्यों मुझे दिखता नहीं
चाहतों का अब दिया जलता नहीं।।

वक्त भी देता मुझे धोखा सदा
साथ मेरे ये कभी टिकता नही।।

जख्म ताजा है अभी दिल का मेरे
जख्म का चारा कोई मिलता नहीं

एक सांचे में ढले होते अगर
प्रेम जग से फिर कभी चुकता नहीं।

फासले क्यों लोग रखते है यहाँ
फासलों से प्रेम निज बढ़ता नही।।

अजनबी सब एक दुजे से बने
आज याराना कही दिखता नहीं।।

खोजता है आदमी भगवान को
और उसका कुछ पता मिलता नही

ये जवानी चार दिन की चांदनी
नूर इसका उम्र भर रहता नही।।

बाँट कर सब खा सकें अब रोटियाँ
ये इरादा फूलता फलता नहीं।।

भूलना मैं यार को चाहूँ मगर
याद कुछ उसके सिवा रहता नही

इस कदर जग में मिला है प्यार भी
‘नाथ’ दिल में अब गिला रहता नहीं।।
!!!!
!!!!
*सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”*

15 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  2. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  3. Uttam Uttam 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  4. C.M. Sharma babucm 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  5. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  6. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 30/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 31/08/2016

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