दूर करके

हे मुरलीधर,हे मनोहर
मेरे अधर तुझे बुलाते हैं
कचोट रहे कलयुग में मुझको
जो तेरा मज़ाक उड़ाते हैं

हे चितचोर ,बांके बिहारी
चोरी का इल्जाम लगाते हैं
ये अंधे धर्मों के शिकारी
रास भोगी तुझे बताते हैं

हिन्दू होकर पथ भर्मित है
अंग्रेजी गान गाते हैं
भक्तवत्सल, मेरे रास रचइया
द्रोपती की लाज बचाते हैं

करते अपमानित तुझको गोविन्द
लीलाएं इतनी दिखाते हो तुम
हे पीताम्बर इन नादानों पर कैसे
मंद मंद मुस्काते हो तुम

हे सखा ,सुदामा से कैसे
दोस्ती अपनी निभाते हो तुम
बीच खड़ा होकर रण में
शंखनाद बजाते हो तुम
बता दो मोहन कैसे तुम
मोह लेते थे सबके मनको
तेरी मुरली की धुन पर कैसे
सब छोड़ चल देते थे वन को

नटवर मेरे बाल गोविंदा
द्वारिकाधीश तुझे बुलाते हैं
दूर करके चरणों से तेरे
कितना मुझे रुलाते हैं

5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 30/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/08/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/08/2016

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