साया-II

SheetSaya2
भीगी भीगी सी लग रही थी, थी थोड़ी सी संकुचायी,
मैंने हाँथ बढ़ाया मदद को, दे दी उसे रजाई ,
बिखरी बिखरी सी उसकी जुल्फ़े, इस कदर झटक रही थी,
पानी की बूंदे मोती-माला बनकर उसकी गर्दन पे लटक रही थी ,
जुल्फों से बिखरा पानी कुछ इस कदर मेरे फर्श पे पड़ रहा था ,
मैं पोंछ पोंछ उस पानी को, बेशक़ीमती मोतियां बिन रहा था।
हांथो से अपने हांथो को रगड़े, किटकिटाते दांतो की ध्वनि दी सुनायी,
देख अवस्था उसकी अचंभित, मैंने छोटी सी आग जलायी।
आग से अपना शरीर तापति ,भौंहे थोड़ी सी चढ़ायी।
ना नाम जानता ना पता पूछता, मैं अंदर ही अंदर खुश था भायी ,
एक भीगी भागी सी लड़की, शीतलेश तेरे घर को आयी ,
हुआ भंग मन मस्त मगन, जब दिखी ना उसकी परछायी,
खुद को देख दर्पण निहारे, पर प्रतिबिम्ब नजर ना आयी ,
थर-थर थर-थर डर से कांपू, मैं दांत रहूँ कीटकटायी,
उसने हाँथ बढ़ाया मदद को, दे दी मुझे रजाई ,
थम गया बारिश का शोर, छटने लगी गहरायी ,
मैं स्तब्ध खड़ा और देख रहा, गायब हो गयी वो परछायी ,
एक अँधेरी रात, दिन के उजाले में जिस तरह थी घिर आयी ,
ख्वाब मेरा या साया था तेरा, जो मुझसे मिलने आयी।
शीतलेश थुल !!

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016

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