पुकार

बूँदें भी है प्यासी
जो धरा की प्यास बुझाये
गम का सागर लिए
बादल से बिछड़ जाये

बूंदों की कौन सुने
धरा तो है प्यासी
वर्षा की हर बूँद में
छुपी है उदासी

अँधेरे में है सितारा
जो देता सबको उजियाला
खुद तम में खोया रहता
मार्ग प्रसस्त सबका करता

सितारों की कौन सुने
जग में तो छाया अँधेरा
करने जग को रोशन
सूरज से जलता सितारा

भूखा मर रहा अन्नदाता
जो सबकी भूख मिटाये
साहूकार के कर्ज तले
मरता जाये किसान

किसान की कौन सुने
राजनीति का फैला जंजाल
दो जून की रोटी को
तरस रहा किसान

मिट रही वो गर्भ में
जो रखती सबको गर्भ में
खुद पीड़ा में रहती
सबको जीवन देती

भ्रूण की कौन सुने
जग में है झूठा अभिमान
नारी ही नारी का
करती है अपमान

जो न सुनी इनकी पुकार
होगा न जग का उद्धार
नारीत्व की रक्षा हेतु
पुनः होगा राम-कृष्ण अवतार

4 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 29/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/08/2016
  3. Kajalsoni 29/08/2016

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