“मोहिंनी”

SheetMohini
रोज रात उसके चेहरे पर निखर जाता है ,
ये वो चाँद है जो उसके कदमो पर बिखर जाता है ,
चाँदनी से तरबतर उसका जिस्म ,
ये वों चकोर है जो उस तरफ मूंह फेर जाता है ,
मदमस्त घटाओं को जुल्फों में समेटे हुये ,
खोल दे तो वो क़यामत तक भीग जाता है ,
तरसूं तेरे दीदार को ए हसीन ,
इक नजर जो देख लूं, हयात-ए-निशात संवर जाता है।
शीतलेश थुल !!

6 Comments

  1. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016
  2. mani mani 29/08/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/08/2016
  5. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/08/2016

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