ये इमारतें

ये इमारतें बड़ी-बड़ी, इन शहरों की
इनमें रहने वाले लोग, हमारे गावों के
देखतें है उचाईयों से, गरीबों के सपनों को
सपने उन गरीबों के, जो पालते है पल-पल में
और धूमिल हो जाते है, गहराईयों में अंधकार के

इन इमारतों की नींव
हमीं पर राखी गयी
और हमीं कैद हुए
इन दीवारों में
जहाँ बाद में चुन चुन के
पिरोये गए ये ईंटे
और ताज महल बनकर
हो गया तैयार

ये प्रकृति,
छीनी गयी हमसे
काटे गए
हमारे अस्तित्व
विकास की परंपरा में
लिपट गए हमारे लोग
हमारे सपनों पर
खुद का महल बनाकर

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 22/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 24/08/2016
  2. babucm babucm 22/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 24/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 30/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 24/08/2016

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