चल दिये चाँद की ओर

हुई जो उनसे,
पहली मुलाक़ात
ख्यालों की बारिश में,
भींग से गए
जो मिले हम उनसे,
दूसरी दफ़ा
हमारे कलमों के नोक भी,
जैसे टूट से गए

चाँद-तारें नज़र आये
कभी हवायें सरसराये
तो फ़िज़ाओं में लिपटी,
ये अदाएं भुनभुनाये
ये सब,बैठ गए एक रोज़
मेरे इर्द-गिर्द कुछ यूँ
की जैसे हमीं ने बस
मुहब्बत के तराने गुनगुनाये

ये सिलसिला कुछ यूँ सा हो गया
की बुढ़ापे तक के सपने आये
उनका ठिकाना कहीं और का हो गया
पर जुबाँ आज भी,जवानी के नग़्मे गाये….

7 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 22/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 22/08/2016
  2. mani mani 22/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/08/2016
  4. KRISHNA 24/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 26/08/2016

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