चुनाव जिंदगी का

क्या चुने, क्या छोड़े
जिंदगी इसी जद्दोजहद में
गुजारी

सुबह का सुर्ख लाल सूरज
रेत पर लम्बी परछाई बना
सागर में बुझ गया
मैं बस रेत के कण चुनता रहा

प्यार बस सोच तक सिमित रहा
हमेशा मेरे ख्वाब और उसकी
मजबूरियां
एक दुसरे की तरफ पीठ किए
खड़े रहे

अपने ही शोर में बारिश की
बुँदे कभी सुनी नहीं मैंने
थक कर बैठने पर
पाया की बारिश भी सिर्फ तन गिला
कर गई

मन कही सूखे पत्ते सा किसी साख से
लिपटा फड़फड़ा रहा है

मेरे इकठ्ठा किए समान
में कुछ टूटे रिश्ते,
मुस्कुराती दोस्ती, और बदलो पर
सवार सपने है

जिन्हें मैंने चुने
जिंदगी में बुने है

रिंकी

17 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
  2. babucm babucm 22/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
  3. mani mani 22/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 22/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/08/2016
    • Rinki Raut Rinki Raut 25/08/2016
  6. jain 24/08/2016

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