माहिया छंद (कविता)

माहिया छंद (कविता)
********************
ऋतु पावस की आई
पिया मिलन की चाह
मन लेता अँगड़ाई
******************
घन घोर घटा छाई
मेघ बिच चपला चमके
रही विरहन घबराई
******************
सावन जब आता है
बीते दिनों के वो
पन्ने उलटाता है
******************
सावन बूँदों के संग
इठलाता है ऐसे
पी ली हो जैसे भंग
*******************
धरती निखार आया
पाकर पावस का संग
कण- कण मुस्काया
*******************
धरती लगे दर्पण
मेघ हुए रीते
सब कुछ किया अर्पण
*******************
दिन में रात हुई
छाई घटा ऐसी
फिर भी ना बात हुई
*********************
— विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,
स.मा. (राज.)322201
मोबा :- 9549165579
Mail :-Vishwambharvyagra@gmail. com
निवेदन :- उक्त रचना मेरी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है |

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/08/2016
  2. Vishwambhar pandey विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' 03/09/2016

Leave a Reply