“अकेलापन”-शीतलेश थुल

Sheetalone
जब कभी मैं खुद को, तनहा महसूस करता हूँ .
तो खुद से ही बातें करने में, मशगुल रहता हूँ .
और शुरू हो जाता है एक नया अध्याय,
जिसके किसी पन्ने में बीते कल की परछाई लिखी होती है .
तो किसी में भविष्य की आशाएं ,
मैं इस सोच में इस कदर डूबा रहता हूँ ,
की अकेलेपन का एहसास ही नहीं होता ,
मुट्ठी भर गर्म रेत पर अगर बीज बोया जाये,
तो उसका अस्तित्व शायद ना हो,
लेकिन मैं रेगिस्तान में भी हरियाली की, कल्पना करता हूँ,
क्योंकि मैं छूना चाहता हूँ, कामयाबी की उन बुलंदियों को,
जिसके सपने ना जाने कितने अपनों ने मेरे लिए संजोये है I
शीतलेश थुल !!

6 Comments

  1. babucm C.m sharma(babbu) 21/08/2016
  2. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 21/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 22/08/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 21/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 22/08/2016

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