“दुश्मन दौड़ रहा सरहद की ओर निहारो”

अरे उठो अवनी के अनगिन चाँद सितारो
दुश्मन दौड़ रहा सरहद की ओर, निहारो

ये वसुंधरा तुमसे कुछ कैसे कह पाए ?
किंतु धरा खंडित होकर कैसे रह पाए ?
अंग विखण्डित शत्रु दुबारा करने आया
फ़िर से सबका मौन वार कैसे सह पाए ?
जो खंडन की चाह लिए हैं उनका धड़ से शीश उतारो
अरे उठो अवनी के अनगिन ——–

हैं मुझको भी प्रेम-यज्ञ-मालाएं जपना
किंतु अगर हो उससे पहले धूमिल सपना
जब पीयूष-थाल में कोई गरल परोसे
तो फ़िर सुनलो बस कर्तव्य यही है अपना
ढाल, भाल लेकर कराल तुम राणा सम रणबीच पधारो
अरे उठो अवनी के अनगिन ————-

आह-आह कर भारतमाता तुम्हें पुकारे
बिखरे भूखण्डों को देख-देख सिसकारे
पूरा विश्व अरुणमय जिसके रश्मि पुंज से
उस भानू को जुगनू की लुप-दुम ललकारे
जिसने क्षीरसिंधु में नहलाया अब उसका कर्ज उतारो
अरे उठो अवनी के अनगिन—————

चंद्रगुप्त ने जिसको शोणित से सींचा है
जो कौटिल्य-कुशाग्र-बुद्धि का बागीचा है
दुश्मन चीर खींचता उसका दुश्शासन बन
फ़िर क्यों बनकर बुद्ध आँख अपनी मींचा है
खंडित भारत भू के डूबे जो तम में वो खंड उबारो
अरे उठो अवनी के अनगिन ————–

रोता जलता इधर बलूचिस्तान पड़ा है
सिंध-हलक में ख़ंज़र पाकिस्तान गढ़ा है
सतलज झेलम रावी की लहरें जलती हैं
शंका-घन में पूरब का ईशान पड़ा हैं
अंधकार के दूतो को अब जलती लौ बनकर संहारो
अरे उठो अवनी के अनगिन ————–

माना रक्षक सरहद पर पूरित पड़ जाएँ
तब क्या हो जब गलियों में दुश्मन अड़ जाएँ ?
यहाँ घूमते फिरते हैं विषदन्त हजारों
आओ मिलकर उनकी छाती पर चढ़ जाएँ
मातृभूमि का मान मिटे ना चाहे तुम परलोक सिधारो
अरे उठो अवनी के अनगिन चाँद सितारो
दुश्मन दौड़ रहा सरहद की ओर, निहारो

———-कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

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  1. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 21/08/2016

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