‘जब शाम गहराती है’_अरुण कुमार तिवारी

जब शाम गहराती है।
जब शाम……

मैं थकी हारी घर आती हूँ,
होती है जंग कोलाहल से|
शान्ति के लिए,
धूप से, जंगल से|
छांव के लिए,
ढूंढती हूँ मतलब के बाज़ार में,
एक अदद प्रीति,
नेह वात्सल्य समर्पण|
और, फिर और थक जाती हूँ|

मैं स्मृति के सागर में,खो जाती हूँ|
फिरने लगती हूँ,
बचपन की गलियों मे|
याद आते हैं वो स्वर्णिम दिन,
जब यूँ ही थकी हारी आती थी|
धुलधूसरित बेख़बर,
माँ डांटकर सुलाने लगती थी,
कुछ, सबकुछ खिला पिलाकर,
मेरे दर्द करते पैरों को दबाती,
लोरी गाती|
सो जा री बिटिया…
सोन चिरईया…..
चन्दा को मामा बताती,
और फिर और, मैं वही लोरी दुहराती हूँ|

ढूँढती हूँ ,तकनीकि की प्रगति में,
निज के भीतर,
अपनी उस माँ को|
समय के दर्पण में,
खुद को,
अपने बच्चों में,
उनके दर्द करते पैरों में,
उस वात्सल्य को|
सब में सब को,
खुद में खुद को|
खुद में तुझको, हाँ माँ तुझको|
कुछ नहीं पाती हूँ!
अनजाने अनचाहे ही पछताती हूँ|
माँ तुम कहाँ हो!
बचा लो मुझे!कर दो शीतल!
लौट आओ मुझमें!
अश्रु की चमकती बूंदे,
फिर और फिर ढुलक जाती हैं|
माँ हर क्षण में ,कण कण में याद आती है|
फिर और फिर याद आती है|

जब शाम गहराती है।
जब शाम गहराती है।

-‘अरुण’
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11 Comments

  1. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 21/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 21/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 21/08/2016
  3. mani mani 21/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 21/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 21/08/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 21/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 21/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/08/2016

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