सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ

सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ
बढ़ते गुनााहों की वजह खोजता हूँ।
इ्रसानियत कहीं कुछ दिखती नही है
फिर भी मैं इंसान क्यूँकर ढूँढ़ता हूँ।

कलह की जड़ें दूर तक फैली हुई हैं
अब घृणा की शाखें भी बढ़ती चली हैं

हर शाख अहं का उल्लू बैठा हुआ है
अंजाम बुरा होने तलक ऐंठा हुआ है।

फिर भी मैं क्यूँ भटकता हूँ शामो-सहर
औ क्यूँ मैं थाह कलह की खोजता हूँ।
सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ
बढ़ते गुनााहों की वजह खोजता हूँ।

झगड़े फसाद सभी हादसे बनते गये
हर मामले बिन न्याय के दबते रहे।

पर समय के साथ चिन्गारियाँ दिखने लगी
आग बदले की सब तरफ जलने लगी।

फिर होगी हर सड़क खूनो-खराबी
इनकी वजह भी मैं क्यूँकर ढूँढ़ता हूँ।
सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ
बढ़ते गुनााहों की वजह खोजता हूँ।

युद्ध भी कलह के विराट रूप बनते गये
बारूदों के ढ़ेर पर सब कुछ धरते गये।

बिछती गई लाशें, पाँव उनपर पड़ते रहे
अणुबम भी गिरे तो सब मरते, सड़ते गये।

यह विकटतम तबाही देख मैं भी
विश्व शांति लाने की मैं सोचता हूँ।
सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ
बढ़ते गुनााहों की वजह खोजता हूँ।

पर मैं यूँ ही तड़पता रहा हरएक पल
आँख बंद किये रोता रहा हरइक पल।

कब तलक राज ये अहं करता रहेगा
मार काट करता हुआ हँसता रहेगा।

है यह इक अजब-सा प्रश्न कि मैं क्यूँकर
सबको इंसान बनाना चाहता हूँ।
सोचना है इसलिये मैं सोचता हूँ
बढ़ते गुनााहों की वजह खोजता हूँ।
….भूपेन्द्र कुमार दवे
00000

One Response

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016

Leave a Reply