“सुप्रभात”

देखो द्वार पर खुशियाँ हैं आयीं
सूर्य का देख ‘छविजाल’
‘तरनि-पुत्रि’ मुस्कायी,

पुष्पों ने ‘पंखुड़ि-पट’ खोले
अधरों से ‘मकरंद’ पियें ‘भँवरे’
देखो ‘कलिका’ रस भर लायी,

उत्ताल करो हृदय की लहरें
अम्बर ने ‘शुचि’ ‘व्योंम’
सुबह पायी ।।

शुभप्रभात…

[तरनि-पुत्रि→सुबह]
– आनन्द कुमार

6 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/08/2016
  2. C.M. Sharma babucm 19/08/2016
  3. mani mani 19/08/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 19/08/2016
  5. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 19/08/2016

Leave a Reply