जग वेदना – गोकुल चन्द्र उपाध्याय

स्वर मेरे कंपित होते जब
ह्रदय स्थिर हो जाता तब
देख चेतना इस जग की
मन विचलित हो जाता है
जागृति का है आभाव
अँधापन सा छाया है
देख दुर्दशा जग की
रुंधन भाव उपज आया है
नूतन अभिलाषा से जन की
अचल उपल बन आया है
गगन चुंबी इमारतों ने
वृक्षों को गिराया है
मिट जाएगा अस्तित्व विश्व का
जो परमाणु बनाया है
हिरोशिमा नागासाकी सा
जग धुआं धुआं हो जायेगा
वेदना सुन वसुधा की
नभ भी वेदित हो जाता है
शीष झुकाये हिमपति भी
पानी – पानी हो जाता है
समय है अब संभलने का
दूर अँधियारा करने का
चित्ताकर्षक जग की काया
पुनः नवनिर्माण करने का

6 Comments

  1. happy 17/08/2016
  2. Shiva 18/08/2016
  3. babucm C.m sharma(babbu) 18/08/2016
  4. mani mani 18/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/08/2016
  6. gokul72525 gokul72525 19/08/2016

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