कुछ लिखूँ

कुछ लिखूँ
जो अच्छा हो रहा है,
जैसे बच्चे विद्यालय जा रहे हैं
किसान खेत पर हैं,
जवान सीमा से जुड़े हैं
देश में कुछ गूँजता है।
नदियाँ साफ-सुथरी हो रही हैं
पहाड़ों पर वृक्षारोपण चल रहा है
जंगलों की आग बुझ चुकी है,
गरीबी हट रही है।
आतंक अब इंसान का नहीं
जानवरों का है,
डर मनुष्य का नहीं
राक्षसों का है।
देखो, सूरज उजाला ले आया है,
धरती मातृत्व धारण कर रही है,
वाणी का माधुर्य टटोला जा रहा है,
दुनिया में कुछ गूँजता है।
**महेश रौतेला

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/08/2016
  2. महेश 18/08/2016

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