बरखा

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बदरा फटि फटि जात हैं कुटिया बहि बहि जाय ।
जल जन-जन समात हैं जन जल उबरि न पाय ।

ढहत पुलिया ढहत राह मरि रहे लोग बाग़ ।
बरखा थमे यही चाह अलापें यही राग ।

बिन बरखा के राज में जब जब सूखा होय ।
खेतिहर भूख से मरैं खेती नाही होय ।

बरखा होय त बाढ़ से खेत सब डूबि जाय ।
ठौर ठिकाना छिन रहा खेती कैसे भाय ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com

19 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 17/08/2016
  2. mani mani 17/08/2016
  3. Kajalsoni 17/08/2016
  4. Kajalsoni 17/08/2016
  5. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 17/08/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/08/2016
  7. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/08/2016
  8. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 17/08/2016
  9. sarvajit singh sarvajit singh 17/08/2016
  10. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/08/2016

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