जीवन और निर्वाह

लक्ष्य का न कोई
छोर नज़र आता है
बातों-बातों में भी
शोर नज़र आता है
गति बराबर है
इस धुरी की
फिर भी इंसान
कमज़ोर नज़र आता है

कहानी में, पहला-पहलू,
लड़कपन में बीत जाता है
दूसरे में ही,
इंसान समझ पाता है
तीसरे में,
गतिविधियों की आपा-धापी
चौथा,
“मैं”और”मेरे” में रह जाता है

ये बात इतनी,
आम हो जाती है
गुठलियों की भी,
कीमत बढ़ जाती है
बैठे-बैठे सीढ़ियों पर,
करते हुए,लोगों को इत्तला
अपनी लुटिया भी,
एक दिन डूब ही जाती है

कहते …..

फिर सवालों की
बरसात होती है
उपरवाले से एक
मुलाक़ात होती है
वो बैठा,करता रहता,
पुण्य-पाप का लेखा-जोखा
और अपने कर्म की बस
भुगतान होती है ….

16 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
  2. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 16/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 18/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 18/08/2016
  5. mani mani 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016
  6. Kajalsoni 17/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 17/08/2016

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