मेरे भाई

हर राखी पर कैसी यह सौगात दे दी ,
कि आँखों को कैसी यह बरसात दे दी ,
काली नागिन से लंबी काली रात दे दी ,
कि शह भी न बोले ,हमें मात दे दी।

भाई तुम तो थे बड़े अच्छे खिलाडी,
ऊतारी क्यों पटरी से जीवन की गाडी ,
खिलाड़ियों की करी तुमने कैसी हसाई ,
यह किस शुन्य में खो गए मेरे भाई।

राखी पर देते तुम हर दम चवन्नी ,
कहते थे होगी जब अपनी कमाई ,
दीदी मैं दूँगा पूरी राखी बंधाई ,
पर दे डाली कैसी यह राखी बंधाई,
यह किस शून्य में खो गए मेरे भाई। ,

लिखती थी मैं तुम चुराते थे कलमे ,
मांगने पर किया करते पूरी ढिठाई ,
पीछे से आ कर फिर स्याही छिड़कते ,
कि स्याही से हो जाती होली खिलाई ,
यह किस शून्य में खो गए मेरे भाई।

गलती हुई कहाँ ? यह समझ नहीं पाई ,
क्या करना था हम सब को, तुम पर कड़ाई,
चाहा था जो ,वोह पाया था सब कुछ ,
क्या अपनी ही खुशियाँ नहीं रास आयी ,
यह किस शुन्य में खो गए मेरे भाई।

अरे मेरे भईया तुम एक बार आते ,
अरे मेरे पंकज ,बस एक बार आते ,
करनी है तुम्हारी वोह जम कर पिटाई ,
यह किस शून्य में खो गए मेरे भाई।

हर राखी पर कैसी यह सौगात दे दी ,
कि आँखों को कैसी यह बरसात दे दी ,
काली नागिन से लंबी काली रात दे दी ,
कि शह भी न बोले ,हमें मात दे दी।