जागृति का उदय – गोकुल चन्द्र उपाध्याय

गुलामी की जंज़ीरों को तोड़
लाचारी से नाता जोड़
कब तक तू बच पाएगा
भारत माँ की मिट्टी में
तू धूल -२ हो जाएगा

सूख गए वो पेड़ सारे
कभी जो आजादी के प्यासे

बँधे थे जब हाथ उनके
मंज़िल तक वो पहुँचे
मुक्त होते ही हाथों ने
मंदिर मस्ज़िद कुचले

धर्म अब हिंसक बना
कर्म को सब भूल गए

गिर रहा है अब हिमालय
जो है शान – ऐ – हिंदुस्तान
खुशियां बनकर बहती नदियां
अब अश्रु में विलगित हुई

बागडोर जो सत्ता की
अंधो के हाथों चली गई

सैय्या पर है माँ भारती
होगा न कुछ उतार आरती
धूमिल हो रही है छवि
अब कब जागोगे,
उदय हो गया है रवि

बालक का कर्त्तव्य कब निभाओगे
संजीवनी बन माँ के प्राण बचाओगे

सत्ता के कुछ भूखे शेर
हो जाएंगे यही पर ढेर
जागृति का जो उदय हुआ
जनता ने अब विद्रोह किया

कुचल दिए वो सारे फ़न
बन गए थे जो कफ़न

नया सवेरा आने को है
बादल बरखा लाने को है
फिर से मुकुट हिमालय का
शीष भारती के सजने को है

जगा दिया जो जागृति को
सोने न अब देना
ये हिंदुस्तान हमारा है
लुटने अब न देना

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/08/2016
  2. gokul72525 gokul72525 16/08/2016
  3. Kajalsoni 16/08/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/08/2016

Leave a Reply