वो हिन्द का सपूत है..

लहू लुहान जिस्म रक्त आँख में चड़ा हुआ..
गिरा मगर झुका नहीं..पकड़ ध्वजा खड़ा हुआ..
वो सिंह सा दहाड़ता.. वो पर्वतें उखाड़ता..
जो बढ़ रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

वो दुश्मनों पे टूटता है देख काल की तरह..
ज्यों धरा पे फूटता घटा विशाल की तरह..
स्वतंत्रता के यज्ञ में वो आहुती चड़ा हुआ..
जो जल रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

वो सोचता है कीमतों में चाहे उसकी जान हो..
मुकुटमणि स्वतंत्रता माँ भारती की शान हो..
वो विषभरा घड़ा उठा सामान नीलकंठ के..
जो पी रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

-सोनित

8 Comments

  1. vijaykr811 विजय कुमार 15/08/2016
  2. mani mani 15/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/08/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 15/08/2016
  5. Saviakna Savita Verma 15/08/2016
  6. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 15/08/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/08/2016

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