अब न कोई उमंग दिखे

कहीं रंग दिखे, कहीं बदरंग दिखे।
कहीं विरहिणी चिठ्ठी बैरंग दिखे।।

किसके किसके तन पर कपडे डाले।
आधुनिकता में सभी का अंग दिखे।।

हो कैसे स्वप्न साकार समता का।
ऊँच नीच की खाई बेढंग दिखे।।

लोकतंत्र का बेताल, सवाल पूछे।
निज सरकार से क्यों मोहभंग दिखे।।

हो जहर दवा में तो इलाज कैसे।
यहाँ दूध भी डिटर्जेंट संग दिखे।।

गरीब बेबस क्या संघर्ष करेगा।
वह खुद ही गरीबी से तंग दिखे।।

गरीब जन को कौन देगा सहारा।।
रबड़ रीढ़ की सरकार अपंग दिखे।।

हर चेहरे पर लगा नया चेहरा।
बूढ़े की शादी मीना संग दिखे।।

कारवाँ लेकर निकला था मै कभी।
पस्त, अब न कोई आस उमंग दिखे।।

मरते जमीर बीच इमान है कही
उसी आस पर जीवन सतरंग दिखे
!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

(दोस्तों यह एक रचना है प्रत्येक पंक्ति में 20 -20 मात्रा लिए, तथा अंत में एक गुरु! आप इसे गजल न समझ बैठे)

13 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/08/2016
      • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/08/2016
  2. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 14/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/08/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 14/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/08/2016
  5. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 15/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/08/2016
  6. mani mani 15/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/08/2016

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