असमंजस : उत्कर्ष

【व्यथित मन से उत्पन्न एक दर्द भरा नगमा】

मेरी जिंदगी मझदार में है,
अब कैसे पार उतारू….

सोचता पल पल यही में,
कैसे खुद को निकालूँ….

वक़्त भी कम है पड़ा अब,
कौन वो जिसे पुकारू….

मेरी जिंदगी मझदार में………..२

यहाँ वहां सब अपने लगते,
झूठा मन अंदेशा था….

वक़्त ने मुझको चेताया था,
यही नीति संदेशा था…

फंसा रहा में प्रेम जाल में,
जीत उसे कब हारुँ….

मेरी जिंदगी मझदार में है,
अब कैसे पार उतारूं…

क्रमशः जारी…

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✍नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”©
+91 84 4008-4006

नवीन श्रोत्रिय "उत्कर्ष"

नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/08/2016

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