आज़ादी – धीरेन्द्र

आज़ादी

थी फ़िक्र में हर नींद और सांसे थी अक्सर गमजदा
थे शाख हर सिमटे हुए, और फूल खुशबू से जुदा |

हर स्वप्न में थी सिसकियाँ, हर जख्म भी गहरे से थे
था जिस्म तो गोरा मगर, पर कान वो बहरे से थे |

थी जंजीर मानो कह रही, हूँ नीयति अब मैं तेरी
पीड थी खामोश, पर थी सदियों से वो सह रही |

था चरम पर दम्भ उनके, दिल में भी रहम न था
पर सरफरोशों की रगों मे, खून भी तो कम न था |

शूलियों और फासियों पर था उन्हें बेहद यकीं
पर चूमती उन रस्सियों की थी अदा उतनी हसीं |

फिर वो सुबह भी आ गई जब सांस ने ली सांस थी
जय हो अमर वो वीर जिनके हौसलों में आस थी |

थे हर चमन अब गुलशिता, और खुशनुमा हर बाग़ थे
अब था खुला एक आसमा, और हर तरफ परवाज़ थे |
-धीरेन्द्र

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/08/2016
    • Dhirendra Dhirendra 14/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/08/2016
    • Dhirendra Dhirendra 14/08/2016

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