क्या है भारत ।

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एक कल्पना है ये भारत, हरिअर वन-खलिहानो की I
रहे सूखी जहाँ ये धरती तो उसे भारत नही समझना II
एक उम्मीद है ये भारत, जो नित् पथ दिखाए जग को I
बिखरे जो यूँ तूफाँ से तो उसे भारत नहीं समझना II
एक आवाज है ये भारत, जो मधुर ज्ञान दे इस जगत को I
कहीं गुम अगर हो जाए तो उसे भारत नहीं समझना II
एक विचार है ये भारत, संगठित करे जो जगत को I
विभाजन करना अगर चाहे तो उसे भारत नहीं समझना II
एक कर्म है ये भारत, जो जीवन सिखाए जगत को I
जो उलझनो में घिर जाए तो उसे भारत नहीं समझना II
एक स्वप्न है ये भारत, जो धूमिल करें हर हद को I
हलचल से जो टूट जाए तो उसे भारत नहीं समझना II
एक राष्ट्र है ये भारत, जो परिवार कहे इस जगत को I
ये गुण जहाँ मिल जाए तो उसे भारत ही तुम समझना II

::कायल्पिक:
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