रोमैंस की डायरी पे एक कलम, शीर्षक “आवागमन”

चलो कहीं चलतें हैं,
(भवें ऊपर की तरफ उठाते हुए )
“हम्म?”
नहीं-नहीं कुछ भी नहीं,

(थोड़ी देर बाद)
चलो कहीं चलतें हैं,
(मुँह में कुछ चबाते हुए)
“क्या?”
हुँ..हुँ..हुँ.. कुछ भी तो नहीं,

(थोड़ी देर बाद फिर )
चलो कहीं चलते हैं
यहाँ से अब
(गर्दन को ऊपर की ओर उठाते हुए)
“कहाँ?”
यार सवाल पे सवाल क्यूँ?
जाओ, नहीं हैं जवाब

(उठाकर चलने की मुद्रा में )
अरे-अरे-अरे, कहाँ चल दी ?
जाने की बड़ी जल्दी है ?
रुको तो सही पल भर के लिए
मिल गया वो जवाब

दस का बैंगन
पांच का मिर्चा
तीन आलू
२ टमाटर
लेने चलोगी क्या
मार्केट?…………..

(स्वगत)
बन गया भरता,
मसालेदार,………‪#‎Abhinayshukla‬ 14/06/16….

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