दम घुट रहा था…

दम घुट रहा था टहलने निकल गए ।

टहलते हुए बढ़ चले तो बाग़ में पहुँच गए
बेचैनी में बढ़ते हुए कलियों को छू गए
कलियों को समझाया तो फूल रूठ गए
फूलों को सहलाया तो कांटे चुभ गए
काँटों को हटाया तो लहूलुहान हो गए
लहू को थामना चाहा तो दर्द उठ गए
दर्द को सहना चाहा तो आंसू बह गए
आंसुओं को गोद लिया तो वक़्त ठहर गए
लोग वक़्त माँगते जिनके वक़्त गुजर गए
मैंने गुजारना चाहा तो वो थम ही गए
इंसानियत को टटोला तो जख्मी हो गए
जब भी मरहम लगाया जख्म हरे हो गए
दम घुट रहा था टहलने निकल गए ।

दम घुट रहा था टहलने निकल गए ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com

18 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/08/2016
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 13/08/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 13/08/2016
  4. अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 13/08/2016
  5. mani mani 13/08/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/08/2016
  7. sarvajit singh sarvajit singh 13/08/2016
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/08/2016

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