|| भानुमती की पीड़ा ||

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जीवन के ढलते पड़ाव पर, मानव भावुक हो जाता है
रंचमात्र भी दुःख मिले तो, मन और अशक्त हो जाता है || 1 ||
क्षोभ दुःख हो जीवन जिसका, वह कैसे दे मन को धीर
तिल-तिल पीड़ा मिली जिसे हो, कैसे हो ना विकल अधीर || 2 ||
पुत्र दुःख के अश्रु रुके नहीं, कि पति वियोग भी आन पड़ा
महाकाल के मुख ने, सारे कुल को है आ जकड़ा || 3 ||
श्वास-ससुर संग रणभूमि गई मैं, पति का अंतिम दर्शन पाने को
पति की मृत देह के सम्मुख, माँग का सिन्दूर मिटाने को || 4 ||
धूरि-धूसरित काया देख पति की, कातर क्रन्दन की चीत्कार उठी
विधवाओं का देख विलाप, धरा भी थर-थर काँप उठी || 5 ||
रूदन ही रूदन मचा चहुँ ओर, छाती पीटी जाती थी
आश्रयहीन नारियों के क्रन्दन से, धरती कांपी जाती थी || 6 ||
पर क्या करूं दुर्भाग्य को अपने, पति की मति को हरा जिसने
कुलान्तक युद्ध को दिया निमन्त्रण, बन नाग डसा धरा को जिसने || 7 ||
आजीवन रहा जो महत्वाकांक्षी, सका न कुछ जीवन से सीख
स्वार्थ कपट छल छंद से जिसके, आज धरा में व्यापी चीख || 8 ||
ईर्ष्या कपट छल षडयन्त्र, रहे आजीवन मेरे पति के अस्त्र |
महत्वाकांक्षा की अग्नि को किया प्रज्ज्वलित, सम्पूर्ण धरा को किया त्रस्त || 9 ||
मन में उपजी दुर्बुधि ने, जीवन का काला पक्ष ही दिखलाया
ह्रदय में बसी कालिमा ने, सन्मार्ग कभी ना समझाया || 10 ||
जीवन की हर भूल को, सदा उचित था ठहराया |
श्वासों ने छोड़ा साथ किन्तु, भूलों को स्वीकार कदापि न कर पाया || 11 ||
मामा शकुनी का संग मिला, अंगराज सा मिला मित्र |
षड्यन्त्रों का बिछा जाल, विधि ने ज्यों रचा संयोग विचित्र || 12 ||
इर्ष्या कपट छल प्रपंच ही, जीवन का बना मूल मन्त्र |
भोग विलास में बीता जीवन, मन मस्तिष्क में ले षड्यन्त्र || 13 ||
छल से जीता इन्द्रप्रस्थ, पांडवों को बनाया अपना दास |
द्रौपदी को कहकर दासी, भरी सभा में किया उपहास || 14 ||
इस पर भी ना संतोष हुआ, पांचाली का कराया चीरहरण |
वह चीरहरण कुल काल बना, सर्वनाश का किया वरण || 15 ||
पति के अनगिनत दोषों को, मैंने सहर्ष स्वीकार किया |
पत्नी के कर्तव्य को मैंने, पल पल अंगीकार किया || 16 ||
किन्तु जब भरी सभा में, असहाय नारी का अपमान हुआ |
एक अधर्मी की पत्नी होने का, उस दिन मुझको भान हुआ || 17 ||
केवल नारी को ही नहीं, समस्त मर्यादाओं को किया निर्वस्त्र |
महाविनाश की रखी .नीव, मानवता को किया त्रस्त || 18 ||
प्रथम बार मुझे हुई ग्लानि, विधाता ने किससे सम्बन्ध मेरा जोड़ा |
सारी मर्यादाओं का कर विनाश, धर्मपथ का बनता रहा रोड़ा || 19 ||
पांडवों ने पराजय की स्वीकार, वानप्रस्थ को अपनाया || 20 ||
अज्ञातवास भी पूर्ण किया, भोग-विलास को ठुकराया || 21 ||
इस पर भी उन्हें ना न्याय मिला, जिसके वे अधिकारी थे |
केवल युद्ध हेतु मिला आमन्त्रण, छल प्रपंच हुए भारी थे || 22 ||
अन्तकस्वरूप युद्ध का परिणाम तो, ऐसा ही होता है |
उभय पक्ष की क्षति होती है, मानव सिर धुन-धुन कर रोता है || 23 ||
पति की चिता हुई शांत, पर छोड़े अगनित अनुतरित प्रश्न |
करता कौन है भरता कौन है, यह है एक अनसुलझा प्रश्न || 24 ||
पति के समस्त दोष स्वीकार मुझे, पर परिणाम के क्या केवल वे ही उत्तरदायी थे |
क्या पांडव सत्कर्म के पथ के, एकमात्र सच्चे अनुयायी थे || 25 ||
अहंकार पांचाली का, जो सबका अपमान कराता था |
वाणी का असंयम क्षण-प्रतिक्षण, अपमान ज्वाला को भड़काता था || 26 ||
शास्त्रों का कहना है, शारीरिक दोष ना मानव के कहो कभी |
यह तो प्रारब्ध का फल है, जिसके भागी होते हैं जीव सभी || 27 ||
नेत्रहीन श्वसुर को मेरे, जब “अँधा” कहा द्रौपदी ने |
वह अपशब्द ना युद्ध का कारण था, जिसे मौन सुना विद्धजनों ने || 28 ||
माना पांचाली का अपमान हुआ, पर क्या धर्मराज ना दोषी थे |
जुएँ में हारे पत्नी को, क्योंकि वे धर्म-धुरंधर संतोषी थे || 27 ||
भीमसेन का अहंकार, पार्थ को गांडीव का अभिमान |
कर्ण को कहना “सूतपुत्र”, था क्या मानव का करना सम्मान || 28 ||
गुरू द्रोण की प्रतिशोध भावना, क्या मेरे पति का अहंकार न थी |
द्रुपद को करवाया बंदी, क्या अपमान का वह प्रतिकार न थी || 29 ||
जब इक ज्ञानी तपस्वी भी, अपमान नहीं कर पाए सहन |
मेरे पति से समाज को आशा क्यों, कि अपमान गरल वह करे वहन || 30 ||
अगनित छल हुए युद्ध में, पर विद्धजनो की जिह्वा मौन |
.जो विजयी वह धर्म-धुरंधर, पराजित के तर्क सुनेगा कौन || 31 ||
किन्तु नहीं पांडवो. की भूलों पर, मेरे पति की भूल अति भारी थी |
कुल का करने को विनाश, मति उनकी गयी मारी थी || 32 ||
योगीराज श्रीकृष्ण अधर्म का, साथ कदापि न दे सकते |
ना कौरव उनके अप्रिय थे, ना पांडव ही प्रिय हो सकते || 33 ||
प्रारब्ध में लिखाकर लाया था जो, वह उसने रण में खोया था |
मेरे कुल का जो हरष हुआ, वह प्रारब्ध का बोया था || 34 ||
अपनों को खोने की पीड़ा, है मानव का सहज स्वभाव |
पर उभय पक्ष ने खोए स्वजन, सबके मन में हैं दुःख के भाव || 35 ||
न्यायप्रिय है मार्ग धर्म का, अन्याय ना कभी होने देगा |
जो करेगा जैसा भरेगा वैसा, किया हुआ सबको भरना होगा || 36 ||
पूर्व प्रारब्ध था जो बीत गया, आगे का कर्म संवारे हम |
ईश्वर के न्याय पर कर विश्वास, जीवन आप सुधारें हम || 37 ||

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/08/2016
  2. babucm babucm 13/08/2016
  3. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 13/08/2016

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