वादा कागज़ कलम से…………………मनिंदर सिंह “मनी”

कभी भी बेधड़क हो बेवक्त तन्हाईया मेरे सामने आती थी ,
भरी महफ़िल दिल रुआँसा, आंखे नम सी कर जाती थी,,
कहने को बहुत कुछ था, पर डरता था हर लम्हा, कोई मेरे,
ख्वाबो का, अहसासों का जज्बातो का उपहास ना उड़ा दे,,
बेहिसाब शिकार हुआ दुनिया की शतरंज सी चालो का,
नादाँ दिल टूट कर भी था सोचता कोई हाथ मेरी तरफ बढ़ा दे,,
बहुत हुआ अब टूटना बिखरना फिर खुद को समेटना,
पत्थर सा खुद को कर अकेले जीना सीख लिया था मैंने,,
गुजर होने लगी जिंदगी, सिर्फ वक्त को गुजारने के लिए,
खुशिया लिए आ रहे, कागज़ और कलम को देखा था मैंने,,
लिखे कुछ लफ्ज़ अच्छा लगा, फिर लिखता गया कलम पकडे,
लफ्ज़ लफ्ज़ से जुड़ने लगे कागज़ पर कविता बनते देखा था मैंने,,
फिर शुरू हुआ दोस्ती का सिलसिला आहिस्ता आहिस्ता,
टूट रही आस को उम्र भर का सहारा मिलता देखता था मैंने,,
जो भी लिखना अपना लिखना, चाहे अच्छा या बुरा, कोई पढे या ना पढे,
‘मनी” एक वादा कागज़ कलम से खुद को ख़ुशी से करते देखा मैंने

14 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  2. sarvajit singh sarvajit singh 12/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 12/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  4. C.M. Sharma babucm 13/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  5. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 13/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  6. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 13/08/2016
    • mani mani 13/08/2016
  7. Saviakna Savita Verma 13/08/2016
    • mani mani 13/08/2016

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