“क्या करू ??”–शीतलेश थुल

क्या करू ??
आज फिर इस दिल में आस जगी है, अपनों के लिए कुछ करूँ ,
पर रुक जाते है मेरे कदम लडखडा कर, के क्या करूँ ? के क्या करूँ?
जाग उठे है अरमान दिल में बहुत, देश लिए कुछ करूँ,
भ्रष्ट नेताओ को बीच पाकर सोचता हूँ के, तनहा अकेला क्या करूँ?
यूँ तो बापू ने दिलायी आज़ादी केवल लाठी पकड़कर,
मैं कलम हाँथ में लिए सोचता हूँ के क्या करूँ क्या करूँ ?
तोप बन कर गरजते है वीर सिपाही सीमा पर,
मैं बिन बादल बरस कर सोचता हूँ के क्या करूँ क्या करूँ ?
तलवार बन समाज सुधारक जड़ें काटतें हैं कुरीतियों की ,
मैं फ़क़त ढाल बने सोचता हूँ के क्या करूँ क्या करूँ ?
इन्साफ के बाजार में अन्याय का तराजू रख काँटा मारते है लोग ,
मैं बेगुनाही जेब में लिये न्याय का खाली झोला फैलाकर सोचता हूँ के क्या करूँ क्या करूँ ?
बेइमानों की खाकी और चोरों की सफेदी देख ,
“शीतलेश” अपने कपड़ो को रंगहीन देख सोचता है के क्या करूँ क्या करूँ ?
शीतलेश थुल !!

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 13/08/2016
  2. sarvajit singh sarvajit singh 12/08/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 13/08/2016

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