मनन

आज जब देखता हूँ,
इन दरख़्तों को तो
गुज़ारे सारे जख़्म भर जातें है
ख़ामोशियाँ बोल उठती है
मैं स्तंभित हो जाता हूँ
जान कर भी की
ऐसा संभव नहीं
फिर भी छावँ में इनकी
बैठा रहता हूँ
वही पाईईईई की कतार,
लगाता रहता हूँ
जो छटवीं के वक्त,
खेल खेल में लगाता था
ना मोल तब था,
ना मोल अब है,
बस लगाए जा रहा हूँ,
कतार पे कतार…..
किस चीज़ की ?
ये कहना मुश्क़िल है
खुद की स्याही से …………११/०६/१६

7 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 12/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 12/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 12/08/2016
  3. mani mani 12/08/2016
    • अभिनय शुक्ला अभिनय शुक्ला 12/08/2016

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