खुश्बू के मेले

खुश्बू के मेले

मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।
सन्नाटों से बातें करता
गुमसुम बैठा शाम सबेरे।

साँसों के कोलाहल जैसे
भटका करता मन के भीतर
कुढ़नेवाला हर पल पीता
घूँट गरल-सा मुख में धरकर।

बन जाता है शिव-सा जीवन
शांत चित्त से बैठ अकेले।
मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।

नहीं चीखना चाहे चिंता
चुप ही रहती है घबराकर
सिद्ध चित्त में रम जाती है
अंतः से ही सुख रस पाकर।

तभी ध्यान धीरज ले आता
क्षण में करता दूर झमेले।
मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।

वैसे तो भारी लगता है
जीवन जो निर्जन में बसता
सारे अपने जन से हटकर
खुद ही त्यक्त जीव बन रहता।

और व्यथित कर लेता खुद को
शून्य जगत की गोदी लेटे।
मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।

माया सब मैं छोड़ चुका था
लेकर एक पिपासा मन में
यौवन तज मैं वृद्ध बना था
संत बना-सा भटका वन में।

लेकिन अंतिम साँस लिये बिन
लाश बनूँ क्यूँ बैठे बैठे
मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।

संत बनूँ या ना बनूँ मैं
पर इतनी तो चाह रखूँ मैं
जग का रंगमंच यह पाकर
कुछ मुस्कानें बिखरा दूँ मैं।

वीरानों में भी आकर मैं
सजा सकूँ खश्बू के मेले।
मैं वीरानों के झुरमुट में
सोचा करता बैठ अकेले।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/08/2016
  2. C.M. Sharma babucm 12/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/08/2016
    • bhupendradave 12/08/2016

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