पश्चाताप – गोकुल चन्द्र उपाध्याय

उर में उठता एक तूफान
सुर मेरे थे तब नादान
प्रेमाभास से हो अनजान
अनभिज्ञ रहा तेरा पैगाम

पश्चाताप की ये ज्वाला
खिंचती मुझको मधुशाला
आँखों में अँधियारा छाया
जैसे हो काला साया

अहम्मन्यता में नम्यता लिए
चला हूँ मैं अभी
न जाने किस राह में मिले
नयन से नयन कभी

अभिलाषा मेरी बस यही
मिले तू मुझको जब कभी
करे क्षमा मुझे वहीं
चले संग मेरे अभी

5 Comments

  1. babucm babucm 11/08/2016
  2. mani mani 11/08/2016
  3. Kajalsoni 11/08/2016
  4. gokul72525 gokul72525 11/08/2016
  5. Himanshu Srivastav 04/12/2016

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