ग़ज़ल (बीती उम्र कुछ इस तरह कि खुद से हम ना मिल सके)

कल तलक लगता था हमको शहर ये जाना हुआ
इक शख्श अब दीखता नहीं तो शहर ये बीरान है

बीती उम्र कुछ इस तरह कि खुद से हम ना मिल सके
जिंदगी का ये सफ़र क्यों इस कदर अनजान है

गर कहोगें दिन को दिन तो लोग जानेगें गुनाह
अब आज के इस दौर में दीखते कहाँ इन्सान है

इक दर्द का एहसास हमको हर समय मिलता रहा
ये वक़्त की साजिश है या फिर वक़्त का एहसान है

क्यों गैर बनकर पेश आते वक़्त पर अपने ही लोग
अब अपनों की पहचान करना अब नहीं आसान है

प्यासा पथिक और पास में बहता समुन्द्र देखकर
जिंदगी क्या है मदन , कुछ कुछ हुयी पहचान है

ग़ज़ल (बीती उम्र कुछ इस तरह कि खुद से हम ना मिल सके)

मदन मोहन सक्सेना

4 Comments

  1. babucm babucm 10/08/2016
  2. Kajalsoni 10/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/08/2016

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