सबकी ”बात” बराबर

अब “भ्रम ही भ्रम” ये होता है
सारा “जग” ये सोता है
कल कुछ “और” होता था
आज “कुछ-कुछ होता है”
लफड़ा, गली के “नुक्कड़” पर
बात “पंचायत” का होता है…
किस्सा,”मामा” की दुकान का
चूज़ा,”घर-घर” का रोता है
कहते “सब” सुधार देंगे..
जो मुँह मांगो “बाँट” देंगे
पर आती है जब “बारी” उनकी
तब “अपना” उल्लू काट देंगे
जनता है “जनार्दन” कहते
और “बात” अपने मन की करते …
फिर क्यों वे “रटते” रहते ?
की देश का हैं “कल्याण” करते?

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