दोहा इक्कीसी : उत्कर्ष

कविता लेखन सब करो,साध शिल्प अरु छंद ।
कविता खुद से बोलती, उपजे बहु आनंद ।।

कविता लिखना सीखते,बड़े जतन के साथ ।
मुख को जोड़ा पैर से,धड़ से जोड़े हाथ ।।

धड़ से बाजू जोड़िये,मुख को ऊपर जोड़ ।
नीचे पैरो को रखे,नही लेख का तोड़ ।।

बारिश आई जोर की,मन मा उठे हिलोर ।
अंग अंग महकन लगो,नाचन लाग्या मोर ।।

सजन गये परदेश कूँ,कब आवेंगे द्वार ।
राह निहारत बीत ग्यो,देख महीना क्वार ।।

सावन में सुन री सखी,विरहा बैरिन संग ।
साजन कूँ देखे बिना,चढ़े न मोपे रंग ।।

तडप रहा में भी यहाँ,सिसक रही है रात ।
चंद घडी की देर है,होंगे हम तुम साथ ।।

धरती को तर कर गयी,पावस की बौछार ।
प्रीतम सावन बन करे,धरती का श्रृंगार ।१।

हरी ओढ़ कर चूनरी,धरा करे मनुहार ।
आया प्रियतम झूम कर,गाओ सब मल्हार ।२।

प्रीतम मेरी मान लो,चंद घडी की बात ।
भोर परत हम तुम मिले,बस कट जाए रात ।३।

प्रेम डोर से हम बँधे,जन्म जन्म का साथ ।
प्रियतम कभी न छोड़ियो,मुझ दुखिया का हाथ ।४।

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करता तेरी वंदना,करना तू स्वीकार ।
मांग रहा याचक खड़ा,आकर तेरे द्वार ।।
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छुप छुप कर क्या देखते,कैसा सोच विचार ।
कलम उठा लिख दो सभी,नूतन जन आधार ।।
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प्रीत रखे नहि प्रीत अब,प्रीत गयी है खोय ।
प्रीत रतन अनमोल है,समझे प्रीत न कोय ।।
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कान्हा कान्हा जग जपे,कान्हा मिले न कोय ।
कान्हा सग के बीच में,मिलन प्रेम से होय ।।
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विनती है कर जोड़ के,मैं में रहूँ न राम ।
सब कुछ तेरा है दिया,मैं का फिर क्या काम ।।
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बारिश लेकर आ रही,धरती का परिधान ।
आज बहारे गा रही,फिर से मंगलगान ।।

प्रेम भाव ले कीजिये,मत देखो तुम रूप ।
साँझ परे सूरज ढ़ले,छाँव परे ये धूप ।।

आँखों पर चश्मा लगा,होठ हो रहे लाल ।
जुल्म दिल पर ढहा रही,चल मतवाली चाल ।।

जुल्फों की काली घटा,मन उमंग भर जाय ।
गोरा सा वो रूप अब,रहा मुझे तड़पाय ।।

कानो में भी बालियाँ,लटक रही इतराय ।
गोरी गोरे भाल पर,बिंदी शोभा पाय ।।

✍?नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”©
श्रोत्रिय निवास बयाना

एन के उत्कर्ष

एन के उत्कर्ष

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/08/2016
  2. Manjusha Manjusha 11/08/2016
    • नवीन श्रोत्रिय "उत्कर्ष" नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष 11/08/2016

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