हिंदी और मेरे विचार ः उत्कर्ष

विषय : हिंदी साहित्य का उत्थान

हिंदी और मेरे विचार

हिंदी भाषा यह वो भाषा है जो हिन्दुओ के द्वारा बोलचाल और विचारों के आदान प्रदान के लिए सहज और वैज्ञानिक मानदंडों के आधार पर विकसित की गयी थी,यह सम्पूर्ण हिंदुस्तान की भाषा रही है । सनातन काल में संस्कृत भाषा विशेष रूप से प्रचलित थी परंतु यह भाषा अपने जटिल रूप के कारण अपना अस्तित्व खोती रही,और लोगो के आपसी विचारो के आदान प्रदान में दिक्कत आने लगी,लोग देशी भाषा जो एक क्षेत्र विशेष की भाषा होती थी उसका प्रयोग अत्यधिक तौर पर करने लगे,ऐसे में बिचारो के आदान प्रदान के लिए नई भाषा की जरूरत पड़ने लगी,कुछ विद्वानों के सहयोग से हिंदी भाषा का जन्म हुआ और इसकी लिपि देवनागरी विकसित की गयी जो मूलतः देवनगर के आसपास की भाषा मानी गयी है । यह भाषा अपने सरल और सुंदर बोलचाल के लिये सम्पूर्ण हिंदुस्तान में पहचान पा गयी ।
चूंकि अधिक क्षेत्रो में प्रयोग के कारण और हिंदुस्तान के सभी देशी भाषाओ से तालमेल होने के कारण यह *हिंदी* के नाम से जानी जाने लगी ।

*हिंदी साहित्य का उत्थान*
हिंदी भाषा का समय समय क्षय हुआ लेकिन तुलसी,चंद्रवरदाई,सूरदास,कबीर,रसखान,रहीम,आदि कवियों के प्रसिद्द ग्रंथो ने इसका पुनरोत्थान किया ।
चूंकि इनके द्वारा रचित लेख,ग्रन्थ धार्मिक सामाजिक भावनाओ से भरे हुए थे, और इनकी भाषा शैली सुपाच्य, बोधगम्य,और मधुरता पूर्ण थी,
लोगो को पढ़ने में,सुनने में,आनंद आने लगा और हिंदी भाषा एक बार फिर सम्पूर्ण जगत के पटल पर प्रमुख भाष के रूप में उभर कर आई ।
हिंदुस्तान में विदेशी आक्रांताओं आना जाना लगा रहा अतएव हिंदी भाषा में कुछेक शब्द अन्य भाषाओं (उनकी भाषाओ) के प्रयुक्त किये जाने लगे उनमे मुख्यतः उर्दू और अंग्रेजी प्रमुख है ।
वैसे यह भाषा विदेशियो के लिए चुनौती पूर्ण रही है ।
उनको हमे समझने के लिए काफी मसक्कत करनी पड़ी है ।
*आधुनिक हिंदी भाषा*
आज हिंदी भाषा पर फिर से वही संकट आ खड़ा हुआ है जिसका प्रमुख कारण हमारा अन्य भाषाओं के प्रति आकर्षण रहा है ।
आज हिंदुस्तान में हिंदी का उपयोग अंग्रेजी भाषा से कहि कम मालुम जान पड़ता है ।
यह सब पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव है । भारतीय संस्कृति का क्षरण हो रहा है । जिसके कारण भाषा भी अपना वर्चस्व खो रही है ।
और इसके लिए हिंदी पत्र व्यवहार,हिंदी साहित्यिक ग्रन्थ,आदि की जरूरत आन पड़ी है ।
जो लोगो के चेतन पटल पर अपना अधिपत्य स्थापित करें ।
जबकि सत्यता यह है की हम हिंदी भाषा में विचारो का आदान प्रदान द्रुत गति से कर सकते है ।
यह विश्व की एक मात्र ऐसी भाषा है जिसमें प्रत्येक के लिए
अलग से शब्द नियुक्त है ।
यह भाषा बोलचाल की दृष्टि से और वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे लिए वरदान है ।
इस भाषा के द्वारा हमारे कंठ,जिह्वया,आदि का व्यायाम भी हो जाता है जिसके कारण मुख और गले संबंधी बीमारियों का अकारण भय नही रहता ।
जैसा की कहा गया है ।

पहला सुख निरोगी काया”
काया को निरोगी रखने के लिए व्यायाम की जरूरत होती है फिर इस बात से हम खुद को कब तक नकारते रहेंगे ।

“एक पहल”

हिंदी भाषा को आज आधुनिक युग में प्रमुख भाषा के रूप में पुनः उभारने के लिए हम सभी को एकजुट होकर कुछ संकल्प लेने होंगे । जैसे-
हिंदी में पत्र व्यवहार करना,
हिंदी भाषी पत्रकाओ का वाचन पठन करना,
हिंदी कीे तमाम पाठशालाओ को बढ़ावा देकर अन्य भाषाओ को न के बराबर उपयोग में लेकर,हिंदी भाषा में पुनः नये धर्म ग्रंथ और आलेख लिख कर ।
आओ हम अपने पुरखों की विरासत इस सुरक्षित,कसरतकारी,मधुर भाषा की पुनः सम्पूर्ण विश्व में विजय पताका फ़हरावे ।

अंत में एक दोहा सप्रेम आप सभी को समर्पित….

हिंदी भाषा हिन्द की,करे जगत कल्यान ।
मुख मत मोड़े बाबरे,यह पुरखो का मान ।।

✍नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”©
+९१ ८४ ४००८ ४००६
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2 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 07/08/2016

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