दोहे ः उत्कर्ष

प्रीत करी पुरजोर से,गए द्वेष सब भूल ।
हुआ अचंभा देख कर,शूल बने जब फूल ।।
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चार दिना की जिंदगी,कर हरि का गुणगान ।
अंत समय पछतायगा,निकलेगे जब प्राण ।।
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मद माया संग न चले,काहे करे गुमान ।
लाख टका की बात ये,सुन मूरख नादान ।।
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साढ़ मास की पूर्णिमा,गुरु पूनम कहलाय ।
गुरू ज्ञान की जोत से,तम को दूर भगाय ।।

“गु”और “रू” के मेल से,अन्धकार टर जाय ।
गुरू ज्ञान का पुंज है,सब विधि लियो मनाय ।।

अन्धकार को दूर कर,देते राह दिखाय ।
गुरू कृपा है बलबती,यह गोविन्द बताय ।।

गुरू अलौकिक तेज़ सम,बन पूनम सारंग ।
रोशन सारा जग करे,ज्ञान जोत ले संग ।।

गु गहरा अंधियार है,रु को रोका जान ।
इन दोनो के मेल से,हुआ गुरु निर्माण ।।

साढ़ मास पूनम तिथी,मनभावन है घाम ।
देख मनाता आज जग,दिवस एक गुरु नाम ।।
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✍नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”©
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एन के उत्कर्ष

एन के उत्कर्ष