””धरती और आकाश””

धरती -रंग बिरंग रुप हैं तेरा
देखने से कभी मन न भरा
नीला सरा तन ये तेरा
आज तक न किसी ने देखा
लाल, हरा ,पिला
कभी उजला तो कभी काला
तुम हो रंगीन दुपट्टे वाली
पल भर में रुप बदलने वाली
कभी गरम तो कभी ठंडा
होकर दिल जलाती हो
देखता रहता हूँ मैं तूझे
क्या क्या मंजर दिखती हो
चाँद जैसे मुखड़े पे
सूरज बिंदियां लिए बैठी हो
अपने इस दुपट्टे पे
चाँद तारे लिए बैठी हो
भोली भाली सूरत पे
उदासी लिए क्यों बैठी हो
आँखो से तेरी बरसें पानी
क्या तू भी किसी से
मुहब्बत करती हो
हाँ , करती हूँ इन पड़ पौधों से
जो जग में हरियाली लाते हैं
अपने धूप में जल जल के
दूसरो को छाया देते हैं
ये प्राडी हैं मेरे बच्चे
इस लिए तो मैं रोया करती हूँ
………रवीन्द्र कुमार रमन……..

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/08/2016
  2. RAVINDRA KUMAR RAMAN RAVINDRA KUMAR RAMAN 07/08/2016
  3. Kajalsoni 07/08/2016
    • RAVINDRA KUMAR RAMAN RAVINDRA KUMAR RAMAN 07/08/2016
  4. mani mani 07/08/2016
    • RAVINDRA KUMAR RAMAN RAVINDRA KUMAR RAMAN 07/08/2016

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