दहेज़-एक अभिशाप…..पियुष राज

दहेज़ :एक अभिशाप
शादी,शादी ना रहकर
व्यपार हो गया है
जिस बाप के पास पैसा नहीँ
उसकी बेटी का जीवन
बेकार हो गया

इतने गिर चुके है लोग क़ि
बहु से बढ़कर उनके लिए
आज पैसा हो गया है
देख मेरे ईश्वर
ये जमाना कैसा था
और आज कैसा हो गया है

पैसे के लिए
इमान बिक रहा है
बहु की नही है कोई कीमत
आज बेटा बिक रहा है

दूसरे घर जा कर बेटी
अपना फ़र्ज़ निभाती है
फिर भी होती है प्रताड़ित
ना जाने किस जन्म का
कर्ज़ चुकाती है

लड़की के पिता का
नहीँ होता सम्मान
बेटी भी देते हैं
पैसा भी देते हैं
फिर भी दहेज़ के
दीवानो का ही
रहता हैं शान

ये प्रथा नहीँ
बहुत बड़ा पाप हैं
हर बेटी के लिए
दहेज़-प्रथा अभिशाप हैं
पियुष राज,राजकीय पॉलिटेक्निक,दुधानी, दुमका।
8/7/2016 [ Poem.No-19]

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/08/2016
  2. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 07/08/2016
  3. Kajalsoni 07/08/2016

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