तुम्‍हारी कविता

मुश्किलों से जूझते
लगभग टूटने की कगार से
मैं वापस आया हर बार
क्‍योंकि मैं जानता था
बाकी हैं कुछ बहादुर शब्‍द
जो उलझा सकेंगें वक्‍त को अभी और कुछ देर

बेमजा जब जब हुई जिंदगी

और बासी लगने लगीं
पहचानी सी बेमतलब मुस्‍कानें
और खुद को पाया अकेले
उन्‍हीं साजिशी चेहरों की भीड़ में
तब भी एक उम्‍मीद तो थी बाकी
कि आती ही होगी खुशनुबा झोंके की तरह
कविता की ताजी नयी बहार

जो उड़ाकर ले जायेगी
तमाम जिस्‍मानी और दिमागी बदबू

न तुम आये, न तुम्‍हारी कविता
खुद से ही जूझते जूझते किसी दिन
पत्‍थर हो जाउंगा मेरे दोस्‍त
तब तुम्‍हारे मखमली शब्‍द
छू भी न पायेंगें मुझे

टकराकर लौट जायेगी इस दीवार से
फिर हर कविता

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/08/2016
  3. babucm C.m.sharma(babbu) 07/08/2016
  4. Kajalsoni 07/08/2016
  5. mani mani 07/08/2016

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