मुक्तक ः उत्कर्ष

पास तुम्हारे मोहन बैठा,
नजरें कहाँ निहार रही ?

कहाँ तुम्हारा चित है डोला,
क्या तुम सोच-विचार रही ?

सुन राधे मैं हूँ बस तेरा
इसी बात का ध्यान रखो ।

राधे राधे जपता मन है,
धड़कन तुम्हें पुकार रही ।।

✍नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”©

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/08/2016
  3. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 07/08/2016
  4. Kajalsoni 07/08/2016
  5. mani mani 07/08/2016

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