“मेघ-वर्षा”

ओह ! वो पूरब के ‘व्योंम’,
घिरते आते ‘घनश्याम’,
जस सुबाम पश्च केशपाश ,
तस शुचि व्योंम पश्च घिरते घनश्याम ।

उमड़ि-घुमड़ि , चमकि-दमकि,
विजन अम्बर में करते रोर,
मनहुँ ‘देव’ दुंदभि बजावति,
खल दल भाजति चहुँओर ।

मेघ ध्वनि करते इति-जोर
नभ का हिल जाता ओर-छोर ।

प्रतनु हृदय तरजति,
कैसी है, ये धुधकारि,
स्वगृह वातायनों से झाँकति
किसकी है,ये ललकारि ।

तरु झर्झर करते घनघोर
बढ़ता जाता वेग अति जोर
काली-घटा छाती जाती
रविमण्डल लुप्त होति चहुँओर ।

नभ से बूँदें अविरल गिरती
पृथ्वी पर रव पल-पल करतीं
इक विशेष ध्वनि करती जातीं
मानहुँ सुरबनितनि बृंद सहित
मंगलाचार गातीं जातीं ।

नदियों में दादुर ध्वनि करते
‘जलव्यालनि’ प्रेम-प्रसंग करते ।

वर्षा मन्द होती जाती
शीतल मन्द बयार चलती जाती
काली-घटा छटती जाती
अम्बर में लालिमा छाती जाती ।

विहग नीड़ों से निकलते
भोजन के लिए वे विचरते
‘नीलाम्बर’ में उड़ते जाते
सजल सन्देश देते जाते । ।
– आनन्द कुमार

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/08/2016
  2. mani mani 05/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/08/2016
  4. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 05/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/08/2016

Leave a Reply